Archive for the ‘Hindi Stories’ Category

साली की चुदाई-1

Thursday, September 2nd, 2010

प्रेषक : बिग शॉट

दोस्तो, मैं अन्तर्वासना का नियमित पाठक हूँ। सोचा आप लोगों को अपनी भी एक सच्ची कहानी बताऊँ।

मेरी शादी हुए 12 साल हो चुके है। शादी के समय मेरी उमर 25 साल की थी और मेरी पत्नी की 19 साल, लेकिन घर में वह सबसे बड़ी थी। मेरी दो सालियां हैं। बड़ी की उमर उस समय 16 की थी और छोटी की 12 साल। बड़ी साली का नाम पिंटी है। कद-काठी 5 फुट 2 इंच, रंग हल्का सांवला। फिगर 33-25-28। यह कहानी पिंटी की चुदाई की है।

10+2 पास करने के बाद जब पिंटी कालेज़ पहुँची तो उसे खुला माहौल मिलने के कारण उसके रंग-ढंग काफी बदलने लगे थे। हालांकि पहनती तो सूट-सलवार ही थी मगर कमीज़ की लम्बाई और फिटिंग दिन पर दिन टाईट होते जा रही थी। साथ ही साथ मेरे साथ अकेले में शरारत का कोई मौका वह हाथ से जाने नहीं देती थी। उसका सबसे पसंदीदा था गुदगुदी करना। शुरू में तो मैंने कोई जबाब नहीं दिया। लेकिन धीरे-2 मैं भी बराबरी करने लग पड़ा। पैरों के नीचे, पेट पर, बांहों के नीचे, गर्दन पर, मम्मों के आसपास या फिर जहाँ भी हाथ पड़ जाए। पर यह सब होता था जब आसपास कोई नहीं होता था, चाहे मैं ससुराल में होता या वो मेरे यहाँ आई होती।

एक बार कुछ काम से मैं अपने ससुराल गया था। शाम को वो रसोई में खाना बना रही थी तो मैं पानी पीने के बहाने रसोई में चला गया और पीछे से अपने दोनों हाथों से उसके मम्में बड़े आराम से पकड़ कर खड़ा हो गया। उसने मना नहीं किया और बड़े आराम से खड़ी रह कर अपना काम करती रही। धीरे-2 मैंने उन पर दबाब बढ़ाना शुरू किया और उसे गाल पर चूमना शुरू कर दिया, फिर गर्दन पर और मैंने उसका कान अपने मुँह में ले लिया तो वह कसमसा कर रह गई और कहा- क्या कर रहे हो जीजू ! कोई आ जाएगा।

पर इस सबके कारण मेरा लण्ड खड़ा हो कर उसके चूतड़ों की दरार में लगने लग पड़ा था। तभी मेरी सास रसोई में आ गई और हम अलग खड़े हो बातें करने लग पड़े।

अगले दिन मैं अपने काम से बाहर गया। वापिस दोपहर को घर आया तो मेरी सास एक कमरे में तथा पिंटी और मेरा साला दूसरे कमरे डबल-बैड पर सोए हुए थे। मैंने पिंटी को उठाया तो वह ऊं…. कर के करवट बदल कर सो गई। मैंने फिर से उसे हिलाया मगर वो नहीं उठी और एक बार फिर से करवट बदल कर सो गई। लेकिन इस बार उसका मुँह मेरी तरफ हो गया। पिंटी बैड के किनारे की तरफ थी। बार-2 उठाने पर भी जब वो नहीं उठी तो लगा कि शायद वो सोने का नाटक कर रही है। मैंने धीरे से गले के ऊपर से उसकी कमीज़ में हाथ डाला लेकिन वह जरा भी नहीं हिली। कमीज़ टाईट होने के कारण मेरा हाथ ज्यादा अन्दर तक नहीं जा पाया। मैंने उसके मम्मों को सिर्फ ऊपर से ही छुआ और हाथ बाहर निकाल लिया। और फिर उसके पास बैठ कर उसके होंठ अपने मुँह में ले कर करीब 10 मिनट तक चूसता रहा। वो नींद से तो जग गई पर आराम से लेटी रही और इस सबके मज़े लेती रही। पर इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कर सका क्योंकि साला साथ ही सोया था और अगले दिन मैं वापिस आ गया। चलते वक्त वो बड़े प्यार से व जोर से जफ्फी डाल कर मिली और बोली- आई लव यू जीजू !

मैं समझ गया कि कल दिन में जो कुछ भी हुआ उसके बाद यह चुदवाने के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुकी है। मैंने भी उसे आई लव यू ट्ठू कहा और चला आया।

बी ए के प्रथम वर्ष की परीक्षा के बाद छुट्टियों में वह मेरे पास आई। मैं बहुत ही खुश हुआ। उसका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया। वो पूरे एक महीने के लिए आई थी। मेरी पत्नी ने उस समय एक स्कूल में नौकरी कर ली थी। सुबह 8:40 पर वह स्कूल चली जाती थी। मेरी बेटी भी उसी के साथ जाती थी। मैंने 9:45 पर दफ्तर के लिए जाना होता था। यानि कि पूरा एक घंटा मैं और पिंटी घर पर अकेले होते थे।

एक-दो दिन तो सामान्य निकल गए। तीसरे दिन सुबह अभी 6:15 मेरी पत्नी छत पर कपड़े सुखाने के लिए चली गई। दरवाजे की आवाज से मेरी नींद भी खुल गई। मैं उठा और दूसरे कमरे में देखा साली अभी सोई थी। उसने नाईट सूट पहन रखा था जिसका टॉप थोड़ा छोटा और उसके आधे पेट तक उठा था। टॉप के ऊपर से साफ दिख रहा था कि उसने ब्रा नहीं पहनी है। मैं चुपचाप उसके पास लेट गया और अपना हाथ उसके पेट पर रख दिया। फिर धीरे-2 टॉप के अन्दर से ऊपर को ले जाने लगा। पहले अपना हाथ उसके दाएँ नंगे मम्मे पर रखा और चुचूक को अपनी उंगलियों से पकड़ लिया। लेकिन वो नहीं उठी तो मैंने उसके मम्मे को जोर से दबाया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए और धीरे-2 चूसने लगा। तो उसकी नींद खुली।

उसने पूछा- जीजू यह क्या कर रहे हो? कोई आ जाएगा।

मैंने कहा- तेरी दीदी अभी छत पर गई है और भांजी सोई है, सो कोई डर नहीं है। तेरी दीदी आएगी तो दरवाजे की आवाज होगी तो हम ठीक हो कर बैठ जाएँगें।

यह सुन कर उसने अपना टॉप ऊपर कर दिया।

मैंने पूछा- पहले भी चुसवाएं हैं किसी से क्या?

तो वह बोली- बस एक बार ! वो मैं और मेरी एक सहेली आपस में, बस !

मैं मम्मा चूस रहा था, फिर मैंने पूछा- चुदाई कराई है?
………..
……
पूरी कहानी यहाँ है !

पड़ोस की विधवा भाभी

Monday, August 30th, 2010

प्रेषक : जीत शर्मा

…..

फिर दो दिन बाद मैंने उसे फ़ोन किया, थोड़ी बहुत इधर-उधर की बात की और फिर सीधे मतलब की बात पर आ गया। मैंने कहा- भाभी ! आप जानती हो कि मैंने आपका फ़ोन नंबर क्यों लिया है? उसने कहा- हाँ !

मैं चौंक गया, मैंने कहा- आपको पता है कि मुझे आपसे क्या काम है?

उसने हंसते हुए कहा- देवर को भाभी से और क्या काम होगा !

मेरा तो लण्ड झट से खड़ा हो गया, तो मैंने कहा- कब प्रोग्राम रखना है?

उसने कहा- अभी मेरा बेटा घर आया हुआ है, जब वो वापस अपने बोर्डिंग स्कूल में चला जायेगा, तब कुछ रखेंगे।

मैंने कहा- ठीक है।

कुछ दिनों के बाद उसका बेटा वापस चला गया। मैंने उसे फ़ोन किया और कहा कि आज चुदाई का प्रोग्राम रखते हैं।

वो थोड़ा हिचकिचाई और थोड़ी आनाकानी करने लगी। मेरे घर उस दिन कोई नहीं था, मैंने उसे कहा- मैं आपके घर आ रहा हूँ।

उसने कहा- ठीक है।

फिर मैं उसके घर गया, मेरा लण्ड तना हुआ था, जींस से उभार साफ़ नज़र आ रहा था। मैं उसके घर पहुँचा, वो खाना बना रही थी। हमने थोड़ी देर बात की, मैंने उसे पूछा कि वो अपनी जवानी की प्यास कैसे बुझाती है?

उसने बड़े प्यार से कहा कि वो उंगली-मैथुन कर लेती है। हमने थोड़ी बहुत ऐसी ही बातें कीं। उसकी नज़र मेरे लण्ड पर पड़ी, वो बोली- काफी बड़ा लगता है?

मैंने कहा- खुद ही देख लो !

उसने कहा- अभी नहीं ! मैं खाना खाने के बाद तुमको बुलाती हूं।

मैंने कहा- ठीक है।

फ़िर मैं वहाँ से वापस अपने घर आ गया और उसके फ़ोन का इंतजार करने लगा।

मैं एक बात बता दूँ कि मेरा लण्ड बहुत जल्द ही खड़ा हो जाता है और उसमें से काफी सारा पानी निकलता रहता है, इसलिए मैं कई बार अपने लण्ड पे प्लास्टिक की थैली बांध देता हूँ। उसदिन भी मैंने ऐसा ही किया। फिर थोड़ी देर के बाद उसका फ़ोन आया, मैं झट से उसके घर गया। दरवाज़ा खुला था। मैंने अंदर जाते ही दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। फिर हम दोनों उसके ऊपर के कमरे में चले गए।ऊपर जाते ही उसने मुझे अपनी बाहों में भर लिया और मैंने उसके होटों को चूम लिया। हम करीब दस मिनट तक ऐसे ही एक दूसरे को चूमते रहे। फिर मैंने धीरे से अपना एक हाथ उसके बायें स्तन पर लगाया और उसे मसलने लगा। उसके मुख से सिसकियाँ निकलने लगी- आह……आह…..

मैंने अपना एक हाथ उसके पीछे लगाया और उसकी गांड मसलने लगा। उसने उस दिन नाईट ड्रेस पहना हुआ था। मैं नीचे झुका और उसका ड्रेस नीचे से ऊपर किया और उतार दिया। वाह ! क्या गोरा बदन था उसका ! अब वो सिर्फ काले रंग की ब्रा और पेंटी में थी। मैंने अपने दोनों हाथ उसके स्तनों पर लगाये और मसलने लगा। फिर मैं नीचे झुका, मैंने उसकी पेंटी पर अपना मुँह लगाया और उसकी चूत को पेन्टी के ऊपर से चाटने लगा। वो सिसकियाँ लेने लगी।

फिर मैंने उसको पूरी नंगी कर डाली ! वाह, क्या चूत थी उसकी ! उस पर एक भी बाल नहीं था।

मैंने कहा- भाभी, आज ही सफाई की लगती है?

उसने कहा- पहले कभी किसी औरत को नंगा देखा है?

मैंने कहा- नहीं ! और यह सच भी था।

अब उसकी बारी थी, उसने मेरा टीशर्ट उतारा, मेरे पैंट उतारी और धीरे धीरे करके मुझे बिलकुल नंगा कर दिया और मेरे लण्ड को देख कर तो वो खुश हो गई, बोली- यह तो मेरे पति के लण्ड से दोगुना है। उसने तुंरत ही मेरे लण्ड को अपने मुँह में ले लिया और लॉलीपॉप की तरह …

पूरी कहानी यहाँ है !

छोटी उम्र में बड़ा अनुभव

Sunday, August 29th, 2010

प्रेषिका : रोहिणी कपूर

मेरे भाई का एक दोस्त था, जिसका एक छोटा भाई था जिसका नाम राहुल था। राहुल अपने भाई के साथ कई बार हमारे घर आया करता था। मुझे राहुल शुरु से ही बहुत पसन्द था। धीरे धीरे वो भी मुझे पसन्द करने लगा था। अब वो अपने भाई के बिना भी हमारे घर आने लगा था। हम दोनों अक्सर मोबाईल पे बातें किया करते थे, अब हमारी बातें प्रेमियों की तरह होने लगी थी। वो हमारे घर किसी ना किसी बहाने से आ ही जाता था। घर वाले उसके इस तरह घर आने पे शक भी नहीं करते थे।

इस तरह एक साल बीत गया और अब तक मुझे भी दोस्ती और प्यार में फ़र्क पता चल गया था, मेरे मन में भी राहुल को लेकर कई तरह के खयाल आने शुरु हो गये थे। अब हम मोबाइल पर एक दूसरे का चुम्बन आदि करने लगे थे, इसी तरह राहुल ने मिलने पर भी चुम्बन मांगना शुरु कर दिया लेकिन मैं उसे मना कर देती थी।

लेकिन मैं उसको इस तरह ज्यादा दिन मना नहीं कर पाई और एक दिन वो मुझे पढ़ाने के बहाने मेरे घर आया। मेरी माँ अपने कमरे में टी वी देख रही थी, उस वक्त उसने मुझे अचानक कन्धों से पकड़ लिया और मुझे चुम्मा देने के लिये कहने लगा। इस बार मैं उसको मना नहीं कर पाई और उसने माँ के आ जाने के डर से मुझे धीरे से एक बार चूम कर छोड़ दिया। कुछ ही देर बाद वो वापिस अपने घर चला गया।

उस रात मैं बेसब्री से उसके फोन का इन्तजार कर रही थी कि ग्यारह बजे के करीब उसका फोन आया। मैं बहुत खुश थी।

उसने मुझे पूछा- तुम्हें चुम्बन में मजा आया?

तो मैंने अपने दिल का हाल उसे बता दिया।

उस दिन उसने मेरे साथ फोन सेक्स भी किया। मेरी हालत बहुत खराब हो चुकी थी, मेरा दिल चाह रहा था कि राहुल अभी आ जाये और मुझे अपनी बाहों में भर के वो सब कुछ कर डाले जो फोन पे कह रहा था।

अब हम मिलते तो चुम्बन तो आम हो गया था अब राहुल बेझिझक मेरे शरीर पर जहाँ चाहता हाथ फ़ेरता था। हमने घर से बाहर रेस्टोरेन्ट में भी मिलना शुरू कर दिया था। वहाँ राहुल बेझिझक मेज़ के नीचे मेरी स्कर्ट के अन्दर मेरी जांघों पर हाथ फ़ेरता था कभी मौका पा के शर्ट के उपर से ही मेरे स्तनों को सहला देता था । ये सब मुझे बहुत अच्छा लगता था। घर पे मैं अपने भैया का कम्प्यूटर ही प्रयोग करती थी जिस में मैं कई बार ब्लू-फ़िल्म देखा करती थी। अब मुझे इस सबकी अच्छी तरह समझ आ चुकी थी। मैं मन ही मन ना जाने कितनी बार राहुल के साथ सम्भोगग कर चुकी थी। इस बीच मेरे पापा का तबादला कहीं और हो गया लेकिन मेरी पढ़ाई की वजह से मुझे और मेरी माँ को पठानकोट में ही रुकना पड़ा।

इसी बीच एक बार हमारा एसी खराब हो गया और पापा ने जहाँ से एसी लिया था वहाँ फोन से शिकायत लिखवा दी। उस दिन रविवार था और वो शोरूम बन्द था इसलिए शोरूम के मालिक जो हमारे घर के पास ही रहते थे का बेटा खुद एसी चेक करने हमारे घर आ गया। उनके परिवार से हमारे बहुत अच्छे पारिवारिक सम्बंध थे, अक्सर हमारे घर आते जाते रहते थे। उनका नाम रोहण था, मैं उनको रोहण भैया कहती थी। वो करीब 27-28 साल के होंगे। उन्होंने थोड़ी ही देर में एसी ठीक कर दिया। माँ ने उन्हें कोल्ड ड्रिंक वगैरह पिलाई और कुछ देर बातें करने के बाद वो चले गये। लेकिन इसके बाद उनका हमारे घर आना जाना बढ़ गया। अकसर माँ उनसे फोन पे बातें करती रहती थी जो मुझे अच्छा नहीं लगता था। हम शनिवार और रविवार को पापा के पास चले जाया करते थे या पापा यहाँ आ जाया करते थे और घर की चाबियाँ रोहण भैया के पास ही रहती थी, दूसरी चाबी हमारे पास होती थी।

एक बार माँ किट्टी-पार्टी पे जा रही थी। जब माँ जा रही थी तो रोहण भैया भी बाहर खड़े थे, माँ ने उन्हें मेरा ध्यान रखने को बोला और चली गई। माँ के घर से बाहर जाते ही मैंने राहुल को फोन कर दिया तो राहुल ने घर पे मिलने की जिद करनी शुरु कर दी, मन तो मेरा भी बहुत कर रहा था राहुल को अकेले में मिलने का, मैंने माँ को फोन करके अपनी सहेली के घर जाने का पूछा, माँ ने कह दिया कि मैं 3-4 घंटे में वापिस आ जाउँगी उससे पहले वापिस आ जाना। मैंने राहुल को फोन किया और घर बुला लिया। मैं भी बहुत खुश थी कि आज राहुल के साथ जो अपने सपनों में होते देखा था आज हकीक़त में उसका मजा लूँगी।

इसी बीच राहुल आ गया। राहुल को अन्दर बुला कर मैंने जल्दी से बाहर वाले दरवाज़े को लॉक कर लिया। मैंने उस समय आसमानी रंग की स्कर्ट और सफ़ेद रंग का टोप पहना हुआ था। राहुल ने मुझे वहीं से अपनी बाहों में उठा लिया और बेडरूम में ले गया।

वो कुछ ज्यादा ही जल्दी में लग रहा था। मैंने उसे कहा- माँ ने 3-4 घंटे बाद वापिस आना है, पहले कुछ खा पी तो लो !

लेकिन वो कहने लगा- एक शिफ़्ट हो जाये उसके बाद देखेंगे खाना पीना।

कुछ ही पलों में मैं सिर्फ़ ब्रा और पेंटी में थी। उस समय मैं 30 नम्बर की ब्रा पहनती थी जोकि उम्र के हिसाब से कहीं बड़ा था। अब मैं भी आपा खो चुकी थी मैंने जल्दी से राहुल की टी-शर्ट उतार दी और उसकी पैंट की जिप खोलने लगी, उसने मेरी ब्रा की हुक खोल दी और मेरे मम्मों को बाहर निकाल के …

पूरी कहानी यहाँ है !

लकी प्रोजेक्ट गाइड-3

Friday, August 27th, 2010

प्रेषक : बिग डिक

“लकी प्रोजेक्ट गाइड-२” में आपने पढ़ा कि स्मिता ने किस तरह मुझे बेवकूफ़ बनाया।

मुझे ‘पैशनेट और पावरफ़ुल लवर’ की संज्ञा देने के बाद उसने फ़ुसफ़ुसाते हुए मेरे कानों में कहा था “आपके फोटोग्राफ़्स नेहा ने भी देखे हैं…और वो जल जायेगी जब मैं उसको आज की बात बताऊँगी… बाय सर !”

“टेक केयर !” मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया था…

फ़िर नेहा का मासूम चेहरा मेरी आंखों के सामने घूम गया था…और मेरे होठों पे एक भेदभरी मुस्कान ना चाहते हुए भी आ ही गई थी…

नेहा की आँखें बड़ी-बड़ी थी…हिरणी जैसी…चेहरा गोल मासूम सा…प्यारा सा…बच्चों सा…। मैं उसको बच्चों की तरह ही समझता था…

पर अब जबसे स्मिता ने मुझे यह बताया था कि मेरा पूरा खड़ा प्रचंड लंड नेहा ने भी न सिर्फ़ देखा है…बल्कि ललचाई नज़रों से देखा है, तब से मेरी निगाहें बदल गई, मेरी नीयत बदल गई… मेरा नज़रिया बदल गया।

अब मैं उसके मासूम चेहरे को कम, उसके भरे और गदराये बदन को ज़्यादा देखता था। उसकी हिरणी जैसी आँखे मुझे सेक्सी लगने लगी थी। मैं कल्पना करता था कि उसके स्तन कितने बड़े होंगे… कितने भरे हुए…गोल-गोल.. सोचता था… उसके नितम्ब कितने पुष्ट होंगे….कितने मुलायम होंगे… सोचता था उसकी टांगें कितनी चिकनी होंगी….केले के तने जैसी।

मुझे उसके होंठ अब रसीले नज़र आने लगे थे। मैं जब भी उसको निहारता वो नज़रें झुका लेती थी… मेरी आँखों मे शायद कुछ और नज़र आने लगा था। मैं सोचता था जैसे शशि और स्मिता अपने आप आकर मेरी झोली में गिरी थीं नेहा भी गिरेगी.. और तब जबकि उसने मेरे दैत्यांग की तस्वीरें देखी थी।

मुझे तो यहाँ तक लगता था कि शशि और स्मिता ने अपनी कहानियाँ ज़रूर नेहा को सुनाई होगीं। पर नेहा तो नेहा थी… उसकी मासूमियत और औरतपन को पहले कदम बढ़ाना मंज़ूर नहीं था।

एक दिन लैब में मैं तीनों का सेशन ले रहा था… नेहा अचानक उठी और ‘एक्सक्यूज़ मी’ बोलकर बाहर टॉयलेट की तरफ़ जाने लगी। और मेरी निगाहें उसके नितम्बों पर जम गईं… मैं बोलना भूल गया… उन उठते-गिरते गोल-गोल उभरे नितम्बों को निहारता रहा।

अचानक मैंने देखा कि शशि और स्मिता मुझे देखकर मुस्कुरा रही हैं… मैं झेंप सा गया।

शशि ने कहा,”इसके लिये आपको खुद कोशिश करनी पड़ेगी .. शी इज़ डिफ़रेंट… वो खुद आपके पास नहीं आने वाली… थोड़ी शर्मीली है… बट आइ एम श्योर…. आप कुछ ना कुछ ज़रूर कर लेंगे।”

मैं ऑफ़िस में ऐसी बातें नहीं करना चाहता था, इसलिये मैंने कहा,”अब अपने काम की बात करते हैं !”

बात आई गई हो गई पर मेरे मन में नेहा को पाने की इच्छा तीव्र होती गई।

एक शनिवार को मैंने नेहा को अकेले पाकर पूछ ही लिया,”इस रविवार को क्या कर रही हो?”

“वंडर ला जा रहे हैं !” वंडर ला बैंगलोर से दस-बारह किलोमीटर दूर एक शानदार सा अम्यूज़मेंट पार्क है… जिसमें जॉय राइड्स के अलावा वाटर-पार्क्स भी हैं।

“बॉयफ़्रेंड के साथ?” मैंने भेदभरी मुस्कान के साथ पूछा।

“नहीं…परिवार के साथ…”

मैं मन ही मन खुश हुआ।

मैं रविवार को सुबह जल्दी उठा, नहाया-धोया, नाश्ता करके पिकनिक सैक उठाया और निकल पड़ा वंडर ला की ओर….अपने मंज़िल की तलाश में।

मैंने कुछ देर लेज़र शो देखा, क्रेज़ी राइड किया, टरमाइट राइड और न जाने क्या क्या किया पर सब बेमन से। मैं तो हर जगह सिर्फ़ नेहा को ढूंढ रहा था। चलते-चलते साइड-पाथ पे कोई भी आकर्षक पिछवाड़ा दिखता तो मैं तेजी से उसके आगे देखता कहीं नेहा तो नहीं। ग्यारह बज चुके थे और भीड़ बढ़ती जा रही थी। मैं जिगजैग राइड पे पहुंच गया जो घूमते-घूमते उलटी हो जाती है। दो चक्कर के बाद मुझे ऐसा लगा जैसे फ़ाउन्टेन के पास कोई मेरी तरफ़ हाथ हिला रहा है। राइड रुकने के बाद मैंने उसे गौर से देखा तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा…वो नेहा थी…परपल शॉर्ट स्कर्ट और पीकॉक टॉप में…सेक्सी नेहा।

राइड से उतरते ही मैं फ़टाफ़ट उसके पास गया !

“सर आप यहां कैसे?”

“तुम्हें ढूंढता हुआ चला आया..” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

उसने आंखें इस अंदाज़ में सिकोड़ी जैसे मेरे जुमले के पीछे छुपे मेरे इरादों को जानना चाह रही हो… और मेरे होंठों पर थी सिर्फ़ मुस्कान।

“आप बेशक मेरे साथ रहें पर इस तरह कि मेरे परिवार को पता नहीं चलना चाहिये कि आप और मैं एक दूसरे को जानते हैं !”

“ठीक है !”

सारा दिन मैं नेहा के साथ रहा और उसके साथ वालों किसी को पता नहीं चला। वाटर पार्क में हमने (खास तौर पर मैंने) बहुत मजे किये। शुरुआत मैंने की… वहाँ जहां पानी कमर तक था…पानी में डूबे-डूबे मैं अपने घुटने को उसकी नितम्बों के बीच रगड़ देता.. जब चार-पाँच बार के बाद कोई ऑब्जेक्शन नहीं हुआ तो मुझे लगा या तो यह इग्नोरेंट है या फिर घुटी हुई है।

जो भी हो.. शह पाकर बीच-बीच में मैं अपने घुटने उसकी चूत पे रगड़ देता। पहली बार में तो वो चिहुंक उठी पर ऐसा दिखाया जैसे कुछ हुआ ही ना हो.. उसे पता ही नहीं चल पाया था शायद ! भीड़ के कारण शायद !

करीब आधे घंटे यही घटनाक्रम जारी रहा। अजीब पहेली होती जा रही थी ये नेहा, कुछ समझ में नहीं आ रहा थी चाहती क्या है?

फिर मैंने यही सिलसिला जारी रखा… नितम्ब, चूत और स्तनों को किसी भी ढंग से छू लेता। पानी के अंदर लावा जल रहा था…. मेरा लंड प्रचंड हो चुका था… पूरा लोहे का गरम रॉड… असाधारण और अनियंत्रित। मुट्ठ मारने की तीव्र इच्छा हो रही थी..पर मैं एक सार्वजनिक-स्थल में था… भीड़भाड़ में।

शाम चार बजे लहरें(वेव्स) शुरू होते हैं। ऐसा कृत्रिम माहौल बनाया जाता है जैसे समुद्र तट हो….लहरें आती और जाती हैं…फ़ेनिल उठता है और शांत हो जाता है…किनारे की रेत बह जाती है और वापिस आ जाती है….लोग गले तक जितने पानी में तैरने का मज़ा इस तरह उठाते हैं जैसे सागर तट उठाया जाता है।

मैं भी बह चला….इस जतन के साथ कि मेरा कमर के नीचे का हिस्सा कभी पानी के ऊपर ना आने पाये….और मेरा दुर्दांत लंड कहीं दिख न जाये…लंड शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा था। जब लहरें उठी मैंने गोता लगाया…ऊपर आने ही वाला था कि मेरे लंड पे एक किसी के हाथ का कसाव महसूस हुआ। ऊपर आकर देखा कोई नज़र नहीं आया….

मैंने दुबारा गोता लगाया…..इस बार उस हाथ ने मेरी अंडरवियर खींचकर मेरे लंड को अपने हाथ में लिया। हाथ नाज़ुक सा था…..शर्तिया किसी लड़की का ..

पूरी कहानी यहाँ है !

काली टोपी लाल रुमाल-1

Saturday, August 21st, 2010

उसका पूरा नाम तो था सिमरन पटेल पर स्कूल में उसे सभी केटी (काली टोपी) और घरवाले निक्की या सुम्मी कहते थे पर मेरी बाहों में तो वो सदा सिमसिम या निक्कुड़ी ही बनी रही थी। एक नटखट, नाज़ुक, चुलबुली और नादान कलि मेरे हाथों के खुरदरे स्पर्श और तपिश में डूब कर फूल बन गई और और अपनी खुशबूओं को फिजा में बिखेर कर किसी हसीन फरेब (छलावे) के मानिंद सदा सदा के लिए मेरी आँखों से ओझल हो गई। मेरे दिल का हरेक कतरा तो आज भी फिजा में बिखरी उन खुशबूओं को तलाश रहा है……

प्रेम गुरु के दिल से …

“सिमरन तुम्हें जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई हो !”

“ओह, आभार तमारो, मारा प्रेम” (ओह… थैंक्स मेरे प्रेम) वो पता नहीं क्या सोच रही थी।

कभी कभी वो जब बहुत खुश होती थी तो मेरे साथ गुजराती में भी बतिया लेती थी। पर आज जिस अंदाज़ में उसने ‘मारा प्रेम’ (मेरे प्रेम) कहा था मैं तो इस जुमले का मतलब कई दिनों तक सोच सोच कर ही रोमांचित होता रहा था।

वो कुछ देर ऐसे ही खड़ी सोचती रही और फिर वो हो गया जिसकि कल्पना तो मैंने सपने में भी नहीं की थी। एक एक वो मेरे पास आई और और इससे पहले कि मैं कुछ समझता उसने मेरा सिर पकड़ कर अपनी ओर करते हुए मेरे होंठों को चूम लिया। मैंने तो कभी ख्वाब-ओ-खयालों में भी इसका गुमान नहीं किया था कि वो ऐसा करेगी। मुझे तो अपनी किस्मत पर यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतनी जल्दी यह सब हो जाएगा।

आह … उस एक चुम्बन की लज्जत को तो मैं मरते दम तक नहीं भूलूंगा। क्या खुशबूदार मीठा अहसास था। उसके नर्म नाज़ुक होंठ तो जैसे शहद भरी दो पंखुड़ियां ही थी। आज भी जब मैं उन लम्हों को कभी याद करता हूँ तो बरबस मेरी अंगुलियाँ अपने होंठों पर आ जाती है और मैं घंटों तक उस हसीन फरेब को याद करता रहता हूँ।

सिमरन बिना मेरी ओर देखे अन्दर भाग गई। मैं कितनी देर वहाँ खड़ा रहा मुझे नहीं पता। अचानक मैंने देखा कि सिमरन अपने घर की छत पर खड़ी मेरी ओर ही देख रही है। जब मेरी नज़रें उससे मिली तो उसने उसी पुराने अंदाज़ में अपने दाहिने हाथ की तर्ज़नी अंगुली अपनी कनपटी पर लगा कर घुमाई जिसका मतलब मैं, सिमरन और अब तो आप सब भी जान ही गए हैं। पुरुष अपने आपको कितना भी बड़ा धुरंधर क्यों ना समझे पर नारी जाति के मन की थाह और मन में छिपी भावनाओं को कहाँ समझ पाता है। बरबस मेरे होंठों पर पुरानी फिल्म गुमनाम में मोहम्मद रफ़ी का गया एक गीत निकल पड़ा :

एक लड़की है जिसने जीना मुश्किल कर दिया

वो तुम्हीं हो वो नाजनीन वो तुम्हीं हो वो महज़बीं …

गीत गुनगुनाते हुए जब मैं घर की ओर चला तो मुझे इस बात की बड़ी हैरानी थी कि सिमरन ने मुझे अपने जन्मदिन पर क्यों नहीं बुलाया? खैर जन्मदिन पर बुलाये या ना बुलाये उसके मन में मेरे लिए कोमल भावनाएं और प्रेम का बिरवा तो फूट ही पड़ा है। उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाया। सारी रात बस रोमांच और सपनीली दुनिया में गोते ही लगाता रहा। मुझे तो लगा जैसे मेरे दिल की हर धड़कन उसका ही नाम ले रही हैं, मेरी हर सांस में उसी का अहसास गूँज रहा है मेरी आँखों में वो तो रच बस ही गई है। मेरा जी तो कर रहा था कि मैं बस पुकारता ही चला जाऊं….

मेरी सिमरन …. मेरी सिमसिम ……

अगले चार दिन मैं ना तो स्कूल जा पाया और ना ही ट्यूशन पर। मुझे बुखार हो गया था। मुझे अपने आप पर और इस बुखार पर गुस्सा तो बड़ा आ रहा था पर क्या करता ? बड़ी मुश्किल से यह फुलझड़ी मेरे हाथों में आने को हुई है और ऐसे समय पर मैं खुद उस से नहीं मिल पा रहा हूँ। मैं ही जानता हूँ मैंने ये पिछले तीन दिन कैसे बिताये हैं।

काश ! कुछ ऐसा हो कि सिमरन खुद चल कर मेरे पास आ जाए और मेरी बाहों में समा जाए। बस किसी समंदर का किनारा हो या किसी झील के किनारे पर कोई सूनी सी हवेली हो जहां और दूसरा कोई ना हो। बस मैं और मेरी नाज़नीन सिमरन ही हों और एक दूसरे की बाहों में लिपटे गुटर गूं करते रहें क़यामत आने तक।
…….
पूरी कहानी यहाँ है !

रानी के साथ एक रात

Thursday, August 19th, 2010

प्रेषक : अमन

शहर से पहली बार मैं गाँव की गया था। मेरे लिए एक अलग कमरा और नौकर था, मगर यह नहीं मालूम था कि एक नौकरानी भी रख रखी थी मेरे लिए। शाम होते ही नौकरानी मेरे लिए चाय और नाश्ता लेकर कमरे में पहुँच गई। मैं उसी समय नहा कर निकला था और तौलिये में लिपटा मेरा गठीला बदन देखने लायक था। होता क्यों नहीं, जिम जा कर और कसरत करके मैंने अपनी बदन को गठीला और मजबूत बना रखा था। तौलिया लपेट कर मैं आईने में बाल संवारता जा रहा थी कि मेरी नजर अचानक अपने पीछे किसी पर पड़ी। चोली और लहंगे में लिपटी एक छरहरी काया वाली कंटीली कन्या मेरे पीछे चाय की तश्तरी लिए मेरे गठीले बदन को निहार रही थी।

पीछे मुड़ कर देखा तो वो शरमा गई। उसकी कसी हुई चोली और नाभि के नीचे तक कसा हुआ लहंगा वाकई में गजब ढा रहा था।

छोटे मालिक ! नाश्ता ! उसने कहा।

रख दो ! और सुनो, आगे से पूछ कर कमरे में आना !

जी, गलती हो गई ! उसने कहा और मुड़ कर जाने लगी।

कुछ सोच कर मैंने उसे रोका और कहा- अच्छा, तुम्हारा नाम क्या है?

रानी ! उसने जवाब दिया।

हम्म ! नाम तो अच्छा है, कब से काम करती हो?

साहब, मैं तो हूँ ही आप लोगों की सेवा के लिए …. और बड़े मालिक ने कहा है कि आपका खास ख्याल रखूं.. अगर किसी चीज़ की जरुरत हो तो संकोच मत कीजियेगा …

सच में, रानी कर भरा-पूरा शरीर देख कर कोई भी संकोच नहीं करना चाहेगा …

साहब मैं रात में फिर से आऊँगी ! कह कर रानी अपने मांसल नितम्बों को सेक्सी अदा से मटकाती हुई कमरे से चल दी।

रानी क्या गई मेरे तन बदन में आग लगा गई… मेरा ८ इंच का लंड एकदम से फनफ़ना उठा … दिल कर रहा था कि उसी समय उसे अपनी बाँहों में दबोच लूँ और उसकी मादक जवानी का रस पी लूँ …

खैर रात होने का इन्तज़ार करने लगा। इतने में मामा जी आ गए और कहने लगे- क्यों भांजे, कैसा लगा हमारा इन्तजाम … कोई कसर तो नहीं रह गई?

नहीं मामा जी, सब बहुत बढ़िया है !

और कैसी लगी, तीखी मिर्ची? मामा जी ने कहा

जरा संभल कर ! शहर की मालों से अलग है, खास तुम्हारे लिए ही है …जी भर के मजे करना……और कोई कसर मत रखना …

मैं समझ गया कि उस कंटाप को मामा जी ने मेरे लिए ही रखा है …

अब तो मैं भी पूरे जोश में था कि कैसे अपनी प्यास बुझाई जाये और रात का इन्तज़ार करने लगा।

रात का भोजन तो हो गया और मैं अपने कमरे में लौट गया और रानी का इन्तज़ार करने लगा।

नौ बजे के बाद कमरे का दरवाजा हल्का सा खुला और सजी-धजी रानी मेरे कमरे में आई…

साहब आ सकती हूँ? उसने आवाज लगाई…

आ जाओ, मैंने कहा।

वो आई और बिस्तर पर मेरे बगल में बैठ गई … उसने कसी हुई चोली और कमर के बहुत नीचे से लहंगा पहन रखा था, उसके बालों में मोगरे और चमेली की माला सजी हुई थी, माथे पर बिंदी, आँखों में काजल और होंठों में गजब की लाली थी।

मैंने उसके कमर पर हाथ रखा और तुंरत अपनी बाहों में भींच लिया…

“ज्यादा उतावले मत होईये साहब, रात तो अभी बाकी है और मैं तो आपकी ही हूँ !” रानी ने कहा।

“मुझे साहब मत कहो, मनोज कहो !” मैंने कहा।

वो मेरी बाँहों में लिपट गई और उसके सीने के दो उन्नत उभर मेरे सीने में धँसने लगे।

यूँ तो मैंने शहर में बहुत लड़कियों को चोदा था मगर गाँव की किसी हसीना के साथ ये मेरा पहला मौका था।

मैंने उसके होंठों को अपने होंठों में लिया और धीरे-धीरे चूसने लगा। गजब का स्वाद था ! मेरे हाथ उसकी चिकनी पीठ पर फिसल रहे थे और मेरा ८ इंच का लंड धीरे-धीरे अपने शबाब पर आ रहा था। मगर मैं यह पारी बहुत देर तक खेलना चाहता था और उस नशीली रात का पूरा मजा लेना चाहता था, आखिर मुझे उस गाँव की कली को मसल कर जो रख देना था। रानी की कमर पर हाथ डाल कर मैंने उसे पूरा भींच लिया था। रानी भी अपने रसीले होंठों को मेरे होंठों पर घुमा रही थी जैसे कहना चाहती हो कि चूसो और चूसो मेरे रसीले होंठों को !

मेरे हाथ फिसलते हुए उसके मांसल नितम्बों…

पूरी कहानी यहाँ है !

घरजमाई

Wednesday, August 18th, 2010

प्रेषक : डब्बू

शादी के बाद मैं उन्हीं लोगों के साथ रहने लगा, क्योंकि घर में कोई जवान पुरुष नहीं था और पिताजी की देख-भाल के लिए वहाँ होना जरूरी था।

बड़ी साली माया दिखने में काफी सुन्दर थी लेकिन हमेशा चुपचाप रहती थी, उसके पति गाँव में अध्यापक थे और वो महीने में तीन या चार दिन ही आते थे।

मेरे साथ वो घुल मिल के रहती थी लेकिन कुछ पूछ्ने पर नहीं बताती थी। एक दिन दोपहर मैं घर पे अकेला था तो मैंने खिड़की से देखा कि माया स्कूल से घर आ रही थी, वो भी स्कूल टीचर थी, उसे देखते ही मुझे एक कल्पना सूझी और मैंने उसे पटाने की तरकीब निकाली।

मैंने अपनी चड्डी निकाल के सिर्फ लुंगी पहनी जोकि सामने से खोल सकते थे, और बेडरूम में सो गया। उसके विचार से मेरा लण्ड तन के दस इंच का हो गया था और लुंगी में खडा हुआ था।

थोड़ी देर में माया ताला खोल कर अन्दर आई और मुझे अन्दर उस स्थिति में देखकर मुस्कुराई। वो बड़े प्यार से मेरे तने हुए लिंग को देख रही थी। शायद उसने पहली बार इतना बड़ा हथियार देखा था।

अब उसने अपने कपड़े उतारने शुरू किये। उसने अपनी साड़ी उतार कर बाजू में रखी और फिर ब्लाऊज़ निकाला। वो मुझे सोया हुआ समझकर बिंदास अपने कपड़े बदल रही थी या सब कुछ जानते हुए अनजान बन रही थी।

फिर उसने पेटीकोट उठाकर अंदर से अपनी चड्डी निकाल कर बाजू में रखी। उसी कारण मुझे उसके बड़े बड़े गोरे कूल्हे नजर आये और मेरा लंड और तन गया।

फिर उसने अपनी ब्रा भी निकाली और वो घर में पहनने के कपड़े लेने के लिए मुड़ी तब मैंने उसके बड़े-बड़े गोरे आम जैसे स्तनों के दर्शन किये। उसका पेटीकोट आगे से थोड़ा फटा हुआ था इसलिए पेट के नीचे के बाल भी साफ़ नजर आ रहे थे।

अब मैंने आहिस्ते से अपनी लुंगी सरका दी ताकि मेरा पूरा का पूरा लंड उसको दिखे। जब उसने मेरा दस इंच का लंड खुला देखा तो उसके होश उड़ गए। लगता है उसको नजदीक से देखने की उसको लालसा हुई और वो थोड़ा नीचे झुक गई।

मैं उसी वक़्त उठकर खड़ा हुआ जैसे कि मुझे बाथरूम जाना है। सामने ही उसे देखकर मैंने आश्चर्य से उसे पूछा कि वो कब आई। लेकिन वो बिना कुछ बोले अपनी छाती पर हाथ रखकर खड़ी थी और मेरे नीचे वाले को देखकर मुस्करा रही थी।

मैंने नीचे देखा और उसे कहा- माफ़ करना, सपना देख रहा था, इसीलिए यह हालत हुई है।

तो उसने हंसते हुए कहा- कौन है वो जो सपने में इस सुन्दर चीज से खेल रही थी?

तो मैंने उससे कहा- बुरा नहीं मानना लेकिन वो तुम्हीं हो जो सपने में मुझे सताती हो !

ऐसा कहते हुए मैंने उसको अपनी तरफ खींचा और उसके मुख को चूमा और उसके स्तन अपने हाथ में लेकर कुचलने लगा। लेकिन उसने मुझे जोर का धक्का देकर दूर धकेला और बेड पर बैठकर रोने लगी और कहने लगी- नहीं, मुझे माफ़ करो लेकिन मैं ये सब तुम्हारे साथ नहीं कर सकती, यह पाप है, तुम मेरे बहन के पति हो, यह पाप मैं नहीं कर सकती।

थोड़ी देर उसको रोने देने का बाद मैंने उसे कहा- कैसा पाप ? तुम तो मेरी साली हो और साली तो आधी घरवाली होती है और क्या मुझे मालूम नहीं कि शादी को तीन साल होने के बाद भी तुम्हारी संतान नहीं है क्योंकि तुम्हारा पति तुम्हें यह सुख नहीं दे पाता। क्या तुम नहीं चाहती कि तुम मेरे इस लंड की मालकिन बनो और इसका मजा ..

पूरी कहानी यहाँ है !

मैडम को खुश किया

Tuesday, August 17th, 2010

प्रेषक : सिद्धार्थ

कसी कमीज़ पहनती और ब्रा भी कसी, तो चुचूक खड़े होने की वजह अपने निशान उस पर बना लेते। फिर पढ़ाई तो भाड़ ही में जानी थी। मैं रोज़ ख्यालों में उसके साथ प्यार करता।

खैर मैं इंग्लिश पेपर लेकर उसके घर पेपर पर विचार-विमर्श करने गया। कितनी खूबसूरत लग रही थी शलवार-कमीज़ में। उसकी कमीज़ थोड़ी छोटी थी। उनके घर में इतना शोर नहीं था। लगता था जैसे कोई भी न हो। उनके पति आर्मी में हैं, वो शायद कहीं गए हुए हों।

उन्होंने मुझ से कहा- मैं किताब लाती हूँ फिर देखते हैं कि तुम्हारा पेपर कैसा हुआ।

उन्होंने मुझे अपने कमरे से आवाज़ दी और कहा- यहाँ आ जाओ।

मैं चला गया।

किताब ऊपर वाली शेल्फ़ पर पड़ी थी कमरे में। उफ़ क्या सीन था- मैडम किताब को लेने के लिए ऊपर होतीं और उनकी शर्ट भी ऊँची हो जाती, उनकी कमर नज़र आती। मेरा तो उसी वक़्त खड़ा हो गया। मैं उनके पास गया और मैंने मजाक करते हुए कहा- मैडम, मैं आप को उठाता हूँ, आप किताब उतार लें।

और जो उत्तर मुझे मिला उसकी मुझे बिल्कुल भी आशा नहीं थी।

उन्होंने कहा- हाँ ! ठीक है ! मुझे तुम ऊपर उठाओ।

मैंने जल्दी में जवाब दिया- जी मैडम !

उन्होंने कहा- ठीक है आज मैं तुम्हारा जोर देखूं !

मैं तो चाहता ही यह था। मैं मान गया।

मैडम काफ़ी भारी थी मगर मैंने उन्हें उठा ही लिया। उनकी गांड मेरी पेट से लग रही थी, वो अभी किताब को ऊपर ढूंढ रही थी कि मुझसे पूछने लगी कि थके तो नहीं ?

मैंने कहा- नहीं !

मैंने उसे थोड़ा सा नीचे किया और उसकी गांड अब मेरे खड़े हुए लंड के साथ लगने लगी। उसने कुछ भी नहीं कहा। इससे लग रहा था कि मेरी बरसों की खवाहिश पूरी होने जा रही है।

मैंने पूछा- मैडम, किताब मिली या नहीं?

उसने कहा- सबर करो !

मैंने आहिस्ता-आहिस्ता अपना हाथ उनकी कमीज़ के नीचे ले जाना शुरू किया। उनको लगा कि मैं थक गया हूँ और वो फिसल रही हैं।

खैर मैडम को लगने लगा कि मेरा लंड तो बस मेरी चड्डी फाड़ने लगा था।

उन्होंने फ़ौरन मुझे कहा- तुम मुझे उतार दो !

मैंने उन्हें जल्दी उसे उतार दिया। उफ्फ्फ ! उनके खड़े चुचूक देखकर मेरे अन्दर करंट आ रहा था।

उन्होंने कहा- किताब नहीं मिल रही ! मैं तुम्हारे लिए कुछ पीने को लाती हूँ ! फिर ऐसे ही पेपर देख लेंगे।

मैं कहा- ओ के !

वो किचन में चली गई। मैं अब कमरे में अकेला था। मैंने अपने लंड को जल्दी हाथ लगाया और दबाया ताकि जल्दी ही मुठ निकले और मुझसे मैडम के साथ कोई ग़लती न हो जाये।

मैं अभी अपना लण्ड दबा ही रहा था कि मैडम शरबत लेकर आई। वो कब रसोई से निकली, कुछ पता नहीं चला।
..
पूरी कहानी यहाँ है !

रेखा दीदी की वासना

Sunday, August 15th, 2010

प्रेषक : राज पाल सिंह

… दरवाजा खोला तो पड़ोस की रेखा दी(दी) थी। वे मेरे पड़ोस में अपनी सासू माँ के साथ रहती थी। करीब पैंतीस साल की थी, फिगर सामान्य और रंग गेहुँआ था। हाँ, चूतड़ काफ़ी अच्छे थे। उनके पति ने उन्हें छोड़ कर दूसरी शादी कर ली थी। कारण नहीं पता। उसने अपनी माँ को भी छोड़ दिया था। वे ही अपनी सास का ध्यान रखती थी।

उन्होंने पूछा- कोई है नहीं क्या?

मैंने कहा- नहीं सभी लोग तीन दिनों के लिए बाहर गए हैं।

फिर तो मेरा आना बेकार गया !

मैंने कहा- क्यों? कोई खास काम है क्या ?

उन्होंने कहा- हाँ ! काम तो खास ही है।

मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूँ? मैंने पूछा।

कोई बात नहीं फिर आ जाऊँगी !

ठीक है !

वे जाने लगी और मैंने दरवाजा बंद कर लिया। ज्यों ही मैं वापस टी वी वाले कमरे में पहुँचा कि फिर घण्टी बजी, मैंने फिर दरवाजा खोला तो सामने रेखा दी थी।

मैंने पूछा- क्या हुआ?

उन्होंने कहा- प्यास लगी है पानी पिला दोगे?

मैंने कहा- हाँ ! क्यों नहीं ! आइए, बैठिए !

फिर मैं पानी लेने अंदर आया। मैंने उन्हें पानी दिया। वे बैठ कर गप-शप करने लगी, उनका इरादा जाने का नहीं लग रहा था। हल्की हल्की बारिश भी होने लगी।

बातों-बातों में उन्होंने पूछ लिया- क्या तुम्हारी कोई गर्लफ़्रेन्ड है?

मैंने कहा- हाँ है !

उन्होंने कहा- अच्छा है ! आज के जमाने में गर्लफ़्रेन्ड न होना किसी शर्मिंदगी से कम नहीं होता।

फिर उन्होंने पूछा- घर पर सबको उसके बारे में पता है?

मैंने कहा- नहीं !

तो मुझे क्यों बताया ? उन्होंने फिर पूछा।

मैंने कहा- मुझे यकीन है आप किसी से नहीं कहेंगी।

इतना भरोसा है मुझपर ?

हाँ। क्यों? जब आप मुझसे यह पूछ सकती है तो जाहिर है किसी से कहेंगी नहीं।

फिर उन्होंने कुछ देर बातें की और कहा- तुम्हारा बाथरुम किधर है?

मैंने कहा- क्यों?

उन्होंने कहा- बाथरुम में लोग क्यों जाते हैं?

मैंने कहा- मेरे पीछे आइए।

मैंने उन्हें बाथरूम का रास्ता दिखाया। बारिश तेज होने लगी। वे बाथरुम से निकलकर आंगन में जोरों की बारिश देखने लगी।

मैंने कहा- अब आप घर कैसे जाएंगी।

उन्होंने कहा- कौन सा जंगल में हूँ ! जब बंद होगी तो चली जाउंगी।

अचानक वे बारिश में चली गई और भीगने लगी।

मैंने कहा- अरे यह क्या ? आप बीमार हो जाएँगी।

उन्होंने मुझसे भी पानी में आने को कहा पर मैंने मना कर दिया। फिर भी उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर पानी में खींच लिया। वह पूरी तरह भीग चुकी थी, उनके कपड़े उनके बदन से चिपक गए थे। मैं उनकी सफेद ब्रा और काली पैंटी देख सकता था। मेरा भी खड़ा हो चुका था। मैं समझ रहा था कि उन्हें कुछ चाहिए इसलिए मैंने भी शर्म छोड़ दी। मैंने उन्हें पीछे से अपनी बाहों में भर लिया और उनको अपने लंड का अहसास कराया। उन्होंने हल्की सी आह भरी तो मैं समझ गया कि वे …

पूरी कहानी यहाँ है !

घोंसले की तलाश

Friday, August 13th, 2010

प्रेषक : सेक्सी लौड़ा

जो भी हमारे अन्तर्वासना के पाठक मुज़फ्फरनगर से हैं, वो सभी रामलीला ग्राउंड का नाम ज़रूर जानते होंगे, ये एक जंगली इलाका है जो पर्यटक-स्थल भी है, वहाँ जंगली जानवर आदि भी हैं। रामलीला ग्राउंड प्रेम-परिन्दों के लिए यानि कि युगलों के लिए स्वर्ग है। लड़के-लड़कियाँ दिनभर वहाँ जोड़े बनाकर प्रेमालाप में तल्लीन रहते हैं – बिना रोक-टोक ! कोई पूछने वाला नहीं होता, कौन क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है।

मैं भी अपनी जानेमन को लेकर रामलीला ग्राउंड गया। बाईक पार्क करने के बाद हम प्रेम-परिन्दे अपने लिए एक घोंसला तलाश करने लगे। काफ़ी ऊपर जाने के बाद मुझे एक जगह मिली, जहाँ मैं आराम से अपनी कशिश के साथ अपने प्यार के ग़ुल को ग़ुलिस्ता बना सकता था, और वहाँ किसी को पता भी नहीं चलता, कि कोई बैठा भी है। मैं उसे अपनी बाँहों में लेकर बैठ गया। हम दोनों इधर-उधर की बातें करने लगे, और धीरे-धीरे मैं अपने हाथों से उसकी चूचियाँ दबाने लगा। वो भी मेरे हाथों को पकड़ कर अपनी चूचियाँ और ज़ोरों से दबवाने लगी।

फिर मैंने पीछे से उसके गले और कंधों पर चूमने लगा और उसके मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगीं। फिर मैंने उसका टॉप उतार दिया, वो गुलाबी रंग की ब्रा में थी, सच में क्या क़यामत लग रही थी वो उस समय, जैसे स्वर्ग की कोई अप्सरा धरती पर आ गई हो। मैंने उसकी दोनों चूचियों को अपने दोनों हाथों में भर लिया और मसलने लगा।

वो मेरी बाँहों में कसमसाने लगी, इसके बाद मैंने ऊपर से ही उसकी चूचियों को चूम लिया और घुण्डियों को चूसा और काटा। फिर उसने मुझसे मुँह से ब्रा खोलने के लिए बोला, और मैंने अपने दाँतों से उसकी ब्रा की स्ट्रिप खोली और एक तरफ फेंक दी। अब मेरे सामने उसकी उभरती जवानी थी जिसे मैंने अपने हाथों और मँह में भर लिया। एक हाथ से मैं उसकी बाईं ओर की चूची को दबाने लगा और दाईं तरफ की चूची को अपने मुँह में भर कर चूसने लगा। उसके मुँह से और ज़ोरों की आवाज़ें निकलने लगीं।

फिर मैं अपनी जीभ से उसकी घुण्डियों को सहलाने लगा, उसे ज़ोर का झटका लगा और मैंने उसकी घुण्डियों को दाँतों से पकड़ लिया और हल्के से काट लिया और दूसरी घुण्डी को ज़ोर से मसल दिया।

वो मेरी बाँहों में तड़प उठी।

अब उसने मेरी शर्ट के बटन खोलने चालू किए। मैंने अन्दर बनियान नहीं पहनी थी। फिर वो पागलों की तरह बेतहाशा मेरे छाती पर चूमने लगी, बालों से खेलने लगी, और फिर अपने होंठों से मेरे निप्पलों को चूसने लगी। मैं अब उत्तेजित हुआ जा रहा था और वो अपने गीले होंठों से मुझे चूमे जा रही थी।

मैंने उसे ज़ोर से अपनी बाँहों में भर लिया।

इसके बाद मैंने उसे अपने नीचे लिटा दिया और उसके होंठों को चूसने लगा। हम दोनों के मुँह से सिसकारियाँ निकलने लगीं। उसने अपनी आँखें बन्द कर लीं और हम ऐसे ही आनन्द लेते रहे। फिर मैं अपनी जीभ उसके मुँह में ले गया और वो उसे चूसने लगी – ज़ोरों से !
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पूरी कहानी यहाँ है !