लेखक : विजय पंडित
उसके गोल गोल चूतड़ उसके बैठते ही खिल कर अलग अलग दिखने लगते थे। उसके खूबसूरत चूतड़ मेरी आंखों में नंगे नजर आने लगते थे। मुझे उसे चोदने की इच्छा तो होती थी पर हिम्मत नहीं होती थी। कभी कभी उसे आने में देर हो जाती थी तो मम्मी स्कूल के लिये निकल जाती थी। तब वो मुझ पर लाईन मारा करती थी। बार बार मेरे से बात करती थी। बिना बात ही मेरी बातों पर हंसती थी। मेरी हर बात को ध्यान से सुनती थी। इन सब से मुझे ऐसा जान पड़ता था कि वो मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाह रही है। तब मैंने उसे पटाने की एक तरकीब सोची।
मैं उस दिन का इन्तज़ार करने लगा वो कभी लेट आयेगी तो मम्मी की अनुपस्थिति का फ़ायदा उठा कर जाल डालूंगा। फ़िलहाल मैंने उसके सामने रुपये गिनना और उसे दिखा दिखा कर अपनी जेब में रखना चालू कर दिया था। एक दिन वो लेट हो ही गई। मम्मी स्कूल जा चुकी थी। मैंने कुछ रुपये अपनी मेज पर रख दिये। दाना डालते ही चिड़िया लालच में आ गई।
मुझसे बोली- जय, मुझे कुछ रुपये उधार दोगे, मैं तनख्वाह पर लौटा दूंगी।”
मैंने उसे पचास का एक नोट दे दिया। एक दो दिन बाद उसने फिर मौका देख कर रुपये और उधार ले लिये। मुझे अब यकीन हो गया कि अब वो मुझसे नहीं बच पायेगी। हमेशा की तरह उसने मुझसे फिर पैसे मांगे। मैंने सोचा अब एक कोशिश कर ही लेनी चाहिये। उसकी बेकरारी भी मुझे नजर आने लगी थी।
“आज उधार एक शर्त पर दूंगा।” वो मेरी तरफ़ आस लगा कर देखने लगी। जैसे ही उसकी नजर मेरे पजामे पर पड़ी, उसका उठान उसे नजर आ गया। उसने नीचे देख कर मुझे मुस्करा कर देखा, और कहा,” मैं समझ रही हूँ, फिर भी आप शर्त बतायें।”
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